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Srimad Bhagwat Geeta

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Srimad Bhagwat Geeta

बारहवाँ अध्यायः भक्तियोग- श्रीमद् भगवदगीता

एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥ (१)

Srimad Bhagwat Geeta

ग्यारहवाँ अध्यायः विश्वरूपदर्शनयोग- श्रीमद् भगवदगीता

मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम्‌ ।यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥ (१)

Srimad Bhagwat Geeta

दसवाँ अध्यायः विभूतियोग- श्रीमद् भगवदगीता

भूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वचः ।यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥ (१)

Srimad Bhagwat Geeta

नौवाँ अध्यायः राजविद्याराजगुह्ययोग- श्रीमद् भगवदगीता

इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्‌ ॥ (१)

Srimad Bhagwat Geeta

आठवाँ अध्यायः अक्षरब्रह्मयोग- श्रीमद् भगवदगीता

किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम।अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥ (१)

Srimad Bhagwat Geeta

सातवाँ अध्यायः ज्ञानविज्ञानयोग- श्रीमद् भगवदगीता

मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः।असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥ (१)

Srimad Bhagwat Geeta

छठा अध्यायः आत्मसंयमयोग- श्रीमद् भगवदगीता

श्रीभगवानुवाचअनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥ (१)

Srimad Bhagwat Geeta

पाँचवाँ अध्यायः कर्मसंन्यासयोग- श्रीमद् भगवदगीता

अर्जुन उवाचसंन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्‌ ॥ (१)

Srimad Bhagwat Geeta

चौथा अध्याय: ज्ञानकर्मसन्यासयोग- श्रीमद् भगवदगीता

श्री भगवानुवाचइमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्‌ ।विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्‌ ॥ (१)

Srimad Bhagwat Geeta

तीसरा अध्यायः कर्मयोग- श्रीमद् भगवदगीता

ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥ (१)

Srimad Bhagwat Geeta

दूसरा अध्यायः सांख्ययोग- श्रीमद् भगवदगीता

तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्‌ ।विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥ (१)

Srimad Bhagwat Geeta

पहला अध्यायःअर्जुनविषादयोग- श्रीमद् भगवदगीता

धृतराष्ट्र उवाचधर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय।।1।।